नमस्कार दोस्तों!
कुछ दिनों पहले मैंने हिमाचल प्रदेश के खूबसूरत शहर पालमपुर से नागपुर की एक लंबी यात्रा की। यह यात्रा आधी ऑफिशियल और आधी छुट्टी के मूड में थी। नए साल के आसपास का समय था, इसलिए रास्ते में कई रोमांच और अनपेक्षित अनुभव भी मिले। चलिए, शुरू से शुरू करते हैं।
पालमपुर से दिल्ली: बस की सवारी और’ पीक सीजन’ के रेट!
मेरी योजना 28 दिसंबर को पालमपुर से दिल्ली के लिए बस पकड़ने की थी। ट्रेन के टिकट तो मैंने कुछ दिन पहले बुक कर लिए थे, लेकिन बस का टिकट मैंने तक़रीबन छह-सात दिन पहले ही सुरक्षित कर लिया। पर यहाँ पहला झटका लगा – नए साल के समय टिकट की कीमतें आसमान छू रही थीं! जो सामान्य तौर पर 1000-1200 रुपये का किराया होता है, वो बढ़कर 2500 रुपये हो गया। खैर, यात्रा तो तय थी।
शाम 8:25 बजे की वॉल्वो बस सिर्फ 5 मिनट पहले आई। मैंने क्रू को फोन कर रखा था, इसलिए वे मुझे सीएसकेएचपीकेवी यूनिवर्सिटी के गेट नंबर 1 से लेने आ गए। रात 10:30 बजे बस अंब पहुँची, जहाँ ड्राइवर और क्रू ने डिनर किया। मैंने बस एक गिलास दूध पिया और सुबह लगभग 7 बजे, 29 दिसंबर 2025 की सुबह, मैं कश्मीरी गेट के पास उतर गया।
दिल्ली में मेट्रो का सफर: एयरपोर्ट एक्सप्रेस और भीड़भाड़
कश्मीर गेट से मैंने मेट्रो का टिकट नई दिल्ली के लिए लिया और वहाँ से आगे एयरपोर्ट एक्सप्रेस लाइन पकड़ी। यह मेट्रो (नई दिल्ली, शिवाजी नगर, धौला कुआं, एरोसिटी T3, द्वारका) रूट पर चलती है। मैं द्वारका सेक्टर 21 उतरा, जहाँ पैसिफिक मॉल देखा। मेरे भाई मुझे लेने आए और करीब 8:45 बजे हम उनके अपार्टमेंट पहुँच गए।

मेरी ट्रेन हजरात निजामुद्दीन से शाम 3:50 बजे थी। भाई साहब ऑफिस गए, तो मैंने दोपहर 12 बजे मेट्रो से सराय काले खान – हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन का रुख किया। यह रास्ता मेट्रो से लगभग 90 मिनट का पड़ता है। पहले एयरपोर्ट मेट्रो से धौला कुआं उतरना, फिर वहाँ से 1 किलोमीटर की दूरी मेट्रो के अंदर 7-8 ट्रैवलेटर्स से पार करके दुर्गाबाई देशमुख साउथ (डीडी साउथ) स्टेशन पहुँचना, और फिर वहाँ से गुलाबी लाइन पकड़कर सराय काले खान तक जाना।

भारत की सबसे तेज मेट्रो (Airport Metro Express) का रूट !

स्वचालित पथ (Traveleator ) जो एयरपोर्ट एक्सप्रेस मेट्रो और सराये काले खान हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन को जोड़ते हैं ।
एक जरूरी टिप: मैंने फोनपे से ऑनलाइन टिकट बुक करने की कोशिश की, लेकिन मेट्रो के अंदर सिग्नल कमजोर है। बेहतर है बाहर निकलकर या स्टेशन पर ही टिकट ले लें। टिकट की वैधता आधी रात तक रहती है। मेरे एयरपोर्ट एक्सप्रेस का किराया 64 रुपये और पिंक लाइन का 43 रुपये था।
ट्रेन में देरी और स्टेशन पर समय काटना
स्टेशन पहुँचते ही मुझे एसएमएस मिला कि मेरी ट्रेन – दुरंतो सिकंदराबाद हजरत निजामुद्दीन (12286) – देरी से चलेगी और नया शेड्यूल शाम 8 बजे का है। बाद में यह देरी बढ़कर रात 9:50 बजे तक हो गई। सौभाग्य से मैंने अपना सामान प्लेटफॉर्म नंबर 1 के क्लोक रूम में रख दिया।
लंच के लिए मैं एक पंजाबी ढाबे में गया, लेकिन वहाँ का खाना मेरे लिए बहुत तीखा था। सच कहूँ तो निजामुद्दीन स्टेशन पर अच्छे खाने के विकल्प कम ही हैं। लंच के बाद मैं भाई से मिलने वापस गया और फिर लौटा। इस बीच मैंने स्टेशन के पास 500 रुपये में ईयरफोन खरीदे और अपने ट्रॉली बैग के टायर भी ठीक करवा लिए।
शाम 6 बजे जब वापस स्टेशन आया, तो खाने के मामले में थोड़ा चूसर हो गया। इस बार ऑमलेट, एग रोल, दूध और गाजर का हलवा खाया। यह बहुत अच्छा लगा!
आखिरकार ट्रेन में सवारी
रात 9:50 बजे, मैं अपनी कोच A1, सीट 41 पर सवार हो गया। डिनर आया, लेकिन मैंने इनकार कर दिया क्योंकि स्टेशन पर कुछ खा लिया था। और इस तरह मेरी यात्रा के पहले दो दिन पूरे हुए – एक साहसिक, थकाऊ, पर यादगार शुरुआत!
कुछ सीखें और टिप्स:
- पीक सीजन में यात्रा: त्योहारी सीजन में टिकट बहुत पहले बुक करें और महंगे किराए के लिए तैयार रहें।
- दिल्ली मेट्रो: ऑनलाइन टिकट बुक करने की कोशिश स्टेशन के बाहर या प्लेटफॉर्म पर ही करें। सिग्नल की दिक्कत हो सकती है।
- निजामुद्दीन स्टेशन: खाने के अच्छे विकल्प कम हैं। आसपास ढूंढकर खाएं या पहले से ही कुछ लेकर चलें।
- क्लोकरूम सुविधा: अगर ट्रेन देर से है, तो सामान क्लोक रूम में रख देना बुद्धिमानी है।
दिन2 – 29 दिसंबर: ट्रेन का लंबा सफर और नागपुर पहुँचना
मेरी यात्रा की कहानी का दूसरा दिन पूरी तरह से ट्रेन के अंदर ही बीता। अगर आपको याद हो, तो मैं हजरत निजामुद्दीन से दुरंतो एक्सप्रेस में सवार हो चुका था, जो पहले ही काफी देर से चल रही थी। आइए, आज के अनुभव साझा करता हूँ।

कोहरे और ट्रेन की धीमी रफ़्तार
रात की देरी के बाद भी, सुबह होते-होते एक और चुनौती सामने आई – कोहरा! इसका असर यह हुआ कि ट्रेन की रफ़्तार और धीमी हो गई। कुल मिलाकर, मेरी ट्रेन लगभग 8-9 घंटे देरी से चल रही थी। पर अच्छी बात यह थी कि ट्रेन में खाने-पीने का इंतज़ाम ठीक था। सुबह की चाय, नाश्ता और दोपहर का लंच – सब समय पर मिल गया। ट्रेन कुछ ही स्टेशनों पर रुकी, इसलिए ज्यादातर समय चलते हुए ही बीता।
ट्रेन में समय का सदुपयोग
इतने लंबे सफर को उबाऊ न बनाते हुए, मैंने अपने टैब पर कुछ विडियो देखे। फिर मेरी ‘शॉर्टफॉर्म ऐप’ काम आई, जहाँ मैंने कुछ किताबों के सारांश पढ़े। उसके बाद तो एक पूरी किताब ही पढ़ डाली! कुछ देर की झपकी भी ले ली, और ट्रेन के डब्बे में ही अपनी दैनिक क्रिया (योग/ध्यान) भी कर ली। एक अजीब सी शांति और उत्साह था – शायद नए शहर और नए काम की अपेक्षा से।
नागपुर स्टेशन: स्वच्छता और सौंदर्य

आखिरकार, शाम लगभग 4:45 बजे, ट्रेन नागपुर स्टेशन पर पहुँची। प्लेटफॉर्म बहुत साफ-सुथरा था, और एक तरफ भगवान बुद्ध की एक सुंदर प्रतिमा और एक मॉडल लगा हुआ था, जो नज़र को तुरंत भा गया। पता चला कि नागपुर स्टेशन ने हाल ही में अपनी 100 साल की यात्रा पूरी की है – यह देखकर एक ऐतिहासिक एहसास हुआ।
कैंपस पहुँचना और काम की शुरुआत

स्टेशन से बाहर निकला तो कॉलेज की ओर से भेजा गया वाहन मिल गया। करीब 25-30 मिनट की ड्राइव के बाद हम कॉलेज कैंपस पहुँचे। गेस्ट हाउस छोटा था, लेकिन बिल्कुल साफ और सुविधाजनक। थोड़ी देर बाद, संबंधित स्टाफ और फैकल्टी इंचार्ज मिलने आए और उन्होंने ज़रूरी कागज़ात मुझे सौंप दिए।
थोड़ी थकान थी, इसलिए मैंने जल्दी ही रात का खाना खा लिया और फिर पेपर मूल्यांकन का काम शुरू कर दिया। यह मेरे आगे के दिनों का मुख्य कार्य था। रात करीब 10 बजे, एक लंबे दिन की समाप्ति पर, मैं सो गया।
दिन की सीख और अनुभव:
- यात्रा में देरी: भारतीय रेल में, खासकर सर्दियों में, कोहरे के कारण देरी की संभावना हमेशा बनी रहती है। धैर्य और तैयारी ज़रूरी है।
- समय का सदुपयोग: लंबे सफर को उपयोगी बनाने के लिए किताबें, ऑफलाइन विडियो या ऐप्स बहुत मददगार होते हैं।
- नागपुर स्टेशन: स्वच्छ और सुव्यवस्थित है, और उसका सौंदर्यीकरण देखने लायक है।
- आगे की तैयारी: ऑफिशियल यात्रा में पहुंचते ही काम में जुट जाना अच्छा रहता है – इससे अगले दिन की शुरुआत आसान हो जाती है।
अगले दिन से मेरा असली काम – पेपर मूल्यांकन और कॉलेज की गतिविधियों में हिस्सा लेना – शुरू होना था। उसके बारे में अगले ब्लॉग में चर्चा करूंगा। तब तक शुभ विद्या!
– आपका यात्री मित्र
डॉ देवेश ठाकुर