
हाल ही में मेरी मुलाकात देहरा में अनिल कुमार से हुई, जो 4-5 पशुओं की एक डेयरी यूनिट चला रहे हैं, जिनमें 3 भैंसें शामिल हैं। उन्होंने हाल ही में अपनी 14 लीटर दूध देने वाली भैंस को बेच दिया है। उनकी एक 2.5 वर्षीय भैंस ब्याही जा चुकी है और सफलतापूर्वक गर्भाधान कराया गया है। भैंसों में कृत्रिम गर्भाधान को अपनाना वैज्ञानिक पशुपालन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
1. उत्तम नस्ल का चयन एवं प्रजनन
- मुर्रा भैंस भारत की सबसे लोकप्रिय और उच्च दुग्ध उत्पादन करने वाली नस्लों में से एक है।
- एक अच्छी मुर्रा भैंस 12-16 लीटर दूध प्रतिदिन देती है, जबकि कुछ मामलों में 1600-1800 लीटर दूध एक ब्यांत में उत्पन्न हो सकता है।
- कृत्रिम गर्भाधान (AI) को अपनाकर अच्छी नस्ल के बछड़े प्राप्त किए जा सकते हैं, जिससे दूध उत्पादन में बढ़ोतरी होती है।
2. पोषण एवं देखभाल
- संतुलित आहार देना आवश्यक है, जिसमें हरा चारा (फलीदार चारा), मक्का, गेहूं, जई, बाजरा और तेल बीजों की खल शामिल हो।
- पर्याप्त स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए।
- भैंसों को समय-समय पर पशु चिकित्सक से जांच कराना जरूरी होता है, खासकर खुरपका-मुंहपका और गलघोंटू जैसी बीमारियों से बचाव के लिए टीकाकरण आवश्यक है।
3. आवास एवं रखरखाव
- भैंसों को ठंडी और गर्मी से बचाने के लिए साफ-सुथरा और हवादार बाड़ा होना चाहिए।
- बरसात के मौसम में मच्छरों से बचाव के लिए बाड़े में मच्छरदानी लगाई जा सकती है।
- पशुओं के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए नियमित सफाई और उचित देखभाल आवश्यक है।
निष्कर्ष
अगर भैंस पालन को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किया जाए, जिसमें उत्तम नस्ल, संतुलित पोषण, और बेहतर देखभाल का समावेश हो, तो यह एक लाभदायक व्यवसाय साबित हो सकता है। सरकार की ओर से मुर्रा भैंस की खरीद पर सब्सिडी और पशु किसान क्रेडिट कार्ड जैसी योजनाएं इस व्यवसाय को और अधिक आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाती हैं।